डिग्रियां हासिल करना शिक्षा नहीं, बल्कि सही-गलत की पहचान और मानवीय मूल्यों को समझना ही वास्तविक शिक्षा है।

डिग्रियां हासिल करना शिक्षा नहीं, बल्कि सही-गलत की पहचान और मानवीय मूल्यों को समझना ही वास्तविक शिक्षा है।

संपादकीय | यशोमणि न्यूज़

आज के दौर में शिक्षा का अर्थ अक्सर बड़ी-बड़ी डिग्रियों, ऊंचे पदों, अंग्रेजी भाषा के ज्ञान और आर्थिक सफलता तक सीमित होकर रह गया है। समाज में किसी व्यक्ति की योग्यता का आकलन उसकी शैक्षणिक डिग्रियों और पेशेवर उपलब्धियों से किया जाता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या अधिक पढ़-लिख लेना ही शिक्षित होने की निशानी है? क्या डिग्रियों का ढेर किसी व्यक्ति को विवेकशील, संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान बना सकता है? वास्तविकता यह है कि साक्षर होना और शिक्षित होना दोनों बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं।

साक्षर व्यक्ति वह है जो पढ़ना-लिखना जानता है, शब्दों को समझ सकता है और लिखित जानकारी का उपयोग कर सकता है। लेकिन शिक्षित व्यक्ति वह है जो अपने ज्ञान का उपयोग सही निर्णय लेने, समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने और मानवीय मूल्यों को जीवन में उतारने के लिए करता है। विडंबना देखिए कि आज समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां हैं, लेकिन उनके व्यवहार में विनम्रता नहीं है। पद और प्रतिष्ठा तो है, लेकिन दूसरों के प्रति सम्मान नहीं। कानून की जानकारी है, लेकिन कानून का पालन करने की नीयत नहीं। धार्मिक ग्रंथों का ज्ञान है, लेकिन व्यवहार में मानवता का अभाव है। दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले कई लोग स्वयं नैतिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं।

यही वह अंतर है, जो साक्षरता और वास्तविक शिक्षा के बीच की दूरी को उजागर करता है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि बेहतर इंसान बनाना भी है। यदि कोई व्यक्ति उच्च शिक्षित होने के बावजूद जाति, धर्म, भाषा, आर्थिक स्थिति अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर दूसरों के साथ भेदभाव करता है, तो उसकी डिग्री भले ही बड़ी हो, लेकिन उसकी सोच का दायरा बेहद छोटा है। आज हमारे सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में इस अंतर के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देने वाले भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं। स्वच्छता की बातें करने वाले सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाते हैं। लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देने वाले ही कभी-कभी दूसरों के अधिकारों का हनन करते दिखाई देते हैं। कानून की जानकारी रखने वाले लोग भी अपने स्वार्थ के लिए नियमों को तोड़ने से पीछे नहीं हटते। सवाल यह नहीं है कि हमारे समाज में कितने लोग डिग्रीधारी हैं, बल्कि सवाल यह है कि कितने लोग अपनी शिक्षा का इस्तेमाल समाज को बेहतर बनाने में कर रहे हैं? परिवार, विद्यालय और सामाजिक परिवेश किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बच्चों को केवल किताबों का ज्ञान देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें संस्कार, अनुशासन, सहिष्णुता, संवेदनशीलता, ईमानदारी और दूसरों के प्रति सम्मान का महत्व भी सिखाना होगा। क्योंकि परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना सफलता हो सकती है, लेकिन जीवन की परीक्षा में अच्छा इंसान बनकर उतरना ही वास्तविक उपलब्धि है।

यह भी समझना जरूरी है कि कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति अशिक्षित सोच वाला हो, यह आवश्यक नहीं। समाज में अनेक ऐसे लोग हैं जिनके पास औपचारिक शिक्षा की डिग्रियां नहीं हैं, लेकिन उनके व्यवहार, विचार, ईमानदारी और मानवीय संवेदनाओं में ऐसी परिपक्वता है, जो कई उच्च शिक्षित लोगों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।

अंततः हमें यह स्वीकार करना होगा कि साक्षरता व्यक्ति को अक्षरों का ज्ञान देती है, जबकि वास्तविक शिक्षा उसे जीवन का अर्थ समझाती है। साक्षरता से व्यक्ति पढ़ना सीखता है, लेकिन शिक्षा उसे सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाती है। साक्षरता से जानकारी बढ़ती है, जबकि शिक्षा से विवेक विकसित होता है।

समाज को केवल डिग्रीधारी लोगों की नहीं, बल्कि विवेकशील, चरित्रवान, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिकों की आवश्यकता है।

क्योंकि किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके नाम के आगे लगी डिग्रियों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, विचारों और कर्मों से होती है।

याद रखिए, किताबें पढ़ लेना साक्षरता है, लेकिन किताबों से मिली सीख को अपने आचरण में उतार लेना ही वास्तविक शिक्षा है।

~ लालप्रताप सिंह

Comments

Popular posts from this blog

नालासोपारा विरार लिंक रोड़ पर तेज रफ्तार कार ने पुलिस वाहन को मारी टक्कर, 3 से 4 लोग गंभीर रूप से घायल

नालासोपारा स्टेशन के पास गंदे पानी में चाय की केतलियां धोने का वीडियो वायरल, खाद्य सुरक्षा पर उठे सवाल...

वसई विरार शहर मनपा चुनाव में दिग्गज नेताओं की हार राजनीतिक गलियारों में मचा दी है हलचल