मांडवी वन परिक्षेत्र में अवैध उत्खनन और अतिक्रमण पर सवाल, वनपाल यतीश तरे की कार्यशैली पर उठ रहे हैं सवाल....
मांडवी वन परिक्षेत्र में अवैध उत्खनन और अतिक्रमण पर सवाल!
भातपाड़ा खदान से 15 हायवा, 5 पोकलेन और एक जेसीबी जब्त; कुंभारपाड़ा में दोबारा खड़े हुए कथित अवैध निर्माण पर वन विभाग की चुप्पी क्यों?
वनपाल यतीश तरे की कार्यशैली पर उठे सवाल, उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई की मांग...
विरार ( लालप्रताप सिंह) : मांडवी वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले भातपाड़ा इलाके में कई महीनों से कथित रूप से जारी अवैध उत्खनन के मामले ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 16 अक्टूबर को राजस्व विभाग द्वारा की गई बड़ी कार्रवाई में मौके से 15 हायवा ट्रक, 5 पोकलेन मशीनें और एक जेसीबी जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। इतनी बड़ी संख्या में भारी वाहनों और मशीनों के इस्तेमाल से कथित तौर पर उत्खनन चल रहा था, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि संबंधित वन अधिकारियों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? यदि जानकारी थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह मामला केवल अवैध उत्खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि वन क्षेत्र की निगरानी, सरकारी जमीन की सुरक्षा और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही से भी जुड़ा है। हालांकि, अधिकारियों की भूमिका और कथित लापरवाही की पुष्टि निष्पक्ष जांच के बाद ही हो सकती है।
भातपाड़ा में महीनों तक कैसे चलता रहा कथित अवैध उत्खनन?
स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार, भातपाड़ा क्षेत्र स्थित खदान में पिछले कई महीनों से कथित रूप से अवैध उत्खनन का काम जारी था। 16 अक्टूबर को राजस्व विभाग ने कार्रवाई करते हुए 15 हायवा ट्रक, पांच पोकलेन मशीनें और एक जेसीबी जब्त की। कार्रवाई में जब्त मशीनों और वाहनों की संख्या इस मामले की गंभीरता को दर्शाती है। ऐसे में वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। यदि संबंधित क्षेत्र वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है, तो वहां चल रही गतिविधियों की नियमित निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या वन विभाग को इस गतिविधि की जानकारी थी? यदि जानकारी नहीं थी, तो नियमित गश्त और निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी? और यदि जानकारी थी, तो कार्रवाई के लिए राजस्व विभाग की पहल का इंतजार क्यों करना पड़ा?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग के अधिकारियों को देना चाहिए। साथ ही, यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित खदान में उत्खनन की अनुमति थी या नहीं, उत्खनन का वास्तविक क्षेत्र कितना था और इससे वन भूमि अथवा पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा।
वनपाल यतीश तरे के दौरों को लेकर भी चर्चा
स्थानीय सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि संबंधित क्षेत्र में वनपाल यतीश तरे का कभी-कभार दौरा होता था। सूत्रों के अनुसार, उनके दौरे के दौरान परिसर के कुछ घरों के खिड़की-दरवाजे बंद कर दिए जाते थे।
इस दावे ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। आखिर उनके दौरे के दौरान लोगों को घरों के खिड़की-दरवाजे बंद करने की जरूरत क्यों महसूस होती थी? क्या इसके पीछे कोई विशेष कारण था या यह महज स्थानीय परिस्थितियों से जुड़ी बात थी?
सबसे अहम सवाल यह है कि यदि वन क्षेत्र में लंबे समय तक अवैध उत्खनन होता रहा, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए विभाग ने क्या कदम उठाए?
कुंभारपाड़ा में 'रॉयल पशु आहार' के निर्माण पर फिर विवाद
भातपाड़ा के कथित अवैध उत्खनन के अलावा कुंभारपाड़ा क्षेत्र में पिरकुंडा दरगाह के आगे वन विभाग की जमीन पर स्थित निर्माण को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। वन विभाग के भूखंड पर लगभग 5,000 वर्गफीट क्षेत्र में कथित अवैध निर्माण किया गया है, जहां 'रॉयल पशु आहार' नाम से दुकान संचालित की जा रही है। बता दें कि करीब दो वर्ष पहले तत्कालीन आरएफओ स्वाति आड़े के कार्यकाल में इस निर्माण के विरुद्ध निष्कासन की कार्रवाई की गई थी। किंतु अब वह निर्माण दोबारा खड़ा कर दिया गया है और दुकान फिर अपने पुराने स्वरूप में पुनः संचालित हो रही है। जो कि जांच का विषय है कि पहले की गई कार्रवाई के बाद पुनः उसी स्थान पर दोबारा निर्माण कैसे हुआ। क्या निर्माण को लेकर आवश्यक अनुमति ली गई है? क्या संबंधित भूखंड वास्तव में वन विभाग की जमीन है? यदि ऐसा है, तो जमीन पर दोबारा कब्जे की स्थिति उत्पन्न होने के बाद विभाग ने क्या कार्रवाई की?
इन सवालों का जवाब राजस्व और वन विभाग के उपलब्ध भूमि अभिलेखों, पूर्व कार्रवाई के दस्तावेजों तथा वर्तमान स्थल निरीक्षण से मिल सकता है।
शिकायत के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
स्थानीय लोगों की ओर से यह भी दावा किया जा रहा है कि कुंभारपाड़ा स्थित कथित अवैध निर्माण के संबंध में वनपाल यतीश तरे से शिकायत की गई थी, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आई। यदि वन विभाग ने कोई प्रभावी कार्रवाई की है, तो उसका विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट हो सके।
एक तरफ राजस्व विभाग की कार्रवाई, दूसरी तरफ वन विभाग की निगरानी पर सवाल
भातपाड़ा में राजस्व विभाग की कार्रवाई और कुंभारपाड़ा में कथित तौर पर दोबारा खड़े हुए निर्माण के आरोपों को देखते हुए मांडवी वन परिक्षेत्र की निगरानी व्यवस्था की समीक्षा जरूरी प्रतीत होती है।
वन भूमि की सुरक्षा केवल कागजी रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए नियमित गश्त, अतिक्रमण की पहचान, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।
यदि किसी वन क्षेत्र में महीनों तक अवैध उत्खनन होता रहा हो या सरकारी जमीन पर कार्रवाई के बाद दोबारा निर्माण हो गया हो, तो केवल निचले स्तर पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी जांचना जरूरी होगा कि निगरानी की जिम्मेदारी किस अधिकारी के पास थी, कितने निरीक्षण किए गए और शिकायतों पर क्या कदम उठाए गए।
उच्चाधिकारियों से उठते सवाल
मामले को देखते हुए वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष कई महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—
भातपाड़ा स्थित खदान में उत्खनन के लिए वैध अनुमति थी या नहीं?
यदि उत्खनन अवैध था, तो संबंधित स्थल पर नियमित निगरानी क्यों नहीं हो सकी?
16 अक्टूबर की कार्रवाई के बाद वन विभाग ने अपने स्तर पर क्या कदम उठाए?
कुंभारपाड़ा स्थित कथित 5,000 वर्गफीट निर्माण की भूमि का आधिकारिक रिकॉर्ड क्या कहता है?
यदि उक्त निर्माण पर पहले निष्कासन की कार्रवाई हुई थी, तो दोबारा निर्माण होने के आरोपों की जांच क्यों नहीं की गई?
वनपाल यतीश तरे को की गई कथित शिकायत के बाद कथित निर्माण पर क्या कार्रवाई की गई ? यह महत्वपूर्ण है...
क्या दोनों मामलों की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदारी तय की जाएगी?
अब कार्रवाई होगी या जांच का इंतजार?
भातपाड़ा में जब्त किए गए भारी वाहनों और मशीनों का मामला तथा कुंभारपाड़ा में कथित रूप से दोबारा खड़े हुए निर्माण का विवाद वन भूमि की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
अब देखना यह है कि वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इन मामलों को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या संबंधित स्थलों का संयुक्त निरीक्षण कराया जाएगा? क्या भूमि अभिलेखों और पूर्व कार्रवाई के दस्तावेजों की जांच होगी? क्या शिकायतों पर हुई कार्रवाई का ब्योरा सार्वजनिक किया जाएगा? और यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होगी?
वन भूमि किसी की निजी जागीर नहीं है। उसकी सुरक्षा करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। इसलिए भातपाड़ा के कथित अवैध उत्खनन और कुंभारपाड़ा के कथित अवैध निर्माण के मामलों में पारदर्शी जांच, तथ्यात्मक जवाब और जवाबदेही तय होना आवश्यक है।

Comments
Post a Comment