जब पत्रकार ही पत्रकार को छोटा समझने लगे, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.....

पत्रकारों में भी पनप रही है भेदभाव की भावना.....

जब पत्रकार ही पत्रकार को छोटा समझने लगे, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.....


पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह सत्ता से सवाल पूछे, समाज की आवाज बने और बिना किसी भय या पक्षपात के सच को सामने रखे। लेकिन आज पत्रकारिता के क्षेत्र में ही एक ऐसी प्रवृत्ति धीरे-धीरे जड़ें जमा रही है, जो चिंताजनक है—पत्रकारों के बीच ही भेदभाव।

किस पत्रकार को सम्मान मिलेगा, किसकी खबर को तवज्जो मिलेगी, किसे मंच पर स्थान मिलेगा और किसे किसी कार्यक्रम में बुलाया जाएगा—इन सबका निर्धारण कई बार पत्रकारिता की गुणवत्ता से अधिक उसके संपर्क, प्रभाव, संगठन, आर्थिक हैसियत अथवा व्यक्तिगत समीकरणों से होने लगता है। सवाल यह है कि यदि पत्रकार ही पत्रकार के साथ भेदभाव करेगा, तो आम नागरिक के साथ निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

आज कई स्थानों पर पत्रकारों के बीच छोटे-बड़े का एक अघोषित पैमाना बना दिया गया है। कोई बड़े संस्थान से जुड़ा है तो उसे ‘बड़ा पत्रकार’ मान लिया जाता है और कोई छोटा या स्वतंत्र समाचार माध्यम चला रहा है तो उसकी मेहनत को नजरअंदाज कर दिया जाता है। क्या पत्रकारिता की पहचान संस्थान के आकार से होती है या उसकी कलम की ताकत से?

सच्चाई यह है कि पत्रकारिता का मूल्य प्रेस कार्ड, कैमरे की कीमत या संस्थान के नाम से नहीं, बल्कि खबर की विश्वसनीयता और पत्रकार की निष्पक्षता से तय होना चाहिए।

दुर्भाग्य से पत्रकारों के बीच गुटबाजी भी इस समस्या को बढ़ा रही है। अपने गुट के पत्रकार की गलती पर चुप्पी और दूसरे पत्रकार की छोटी-सी चूक पर हंगामा—यह दोहरा मापदंड पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

यदि कोई पत्रकार गलत करता है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए, लेकिन आलोचना उसके काम की होनी चाहिए, व्यक्ति की नहीं। किसी पत्रकार को केवल इसलिए नजरअंदाज करना कि वह किसी विशेष समूह का हिस्सा नहीं है, पत्रकारिता की स्वस्थ परंपरा नहीं कही जा सकती।

और सबसे बड़ा सवाल उन संस्थाओं और आयोजकों से भी है, जो पत्रकारों के बीच चयनात्मक व्यवहार करते हैं। यदि किसी कार्यक्रम में केवल ‘पसंदीदा’ पत्रकारों को बुलाया जाता है और अन्य पत्रकारों को जानबूझकर दरकिनार किया जाता है, तो यह केवल पत्रकार का अपमान नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता की भावना को कमजोर करने वाला व्यवहार है।

पत्रकारिता कोई निजी जागीर नहीं है। यह समाज के प्रति जिम्मेदारी है।

पत्रकार का काम एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करना हो सकता है, लेकिन एक-दूसरे को नीचा दिखाना नहीं। खबरों की प्रतिस्पर्धा स्वस्थ हो सकती है, मगर पत्रकारों के बीच व्यक्तिगत दुश्मनी, गुटबाजी और भेदभाव अंततः पूरे पेशे की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि पत्रकार स्वयं अपने भीतर झांकें। क्या हम वास्तव में हर पत्रकार की आवाज को समान महत्व देते हैं? क्या हम खबर के आधार पर साथी पत्रकार का मूल्यांकन करते हैं या उसके संबंधों और पहचान के आधार पर? क्या हम अपने साथ हुए भेदभाव पर आवाज उठाते समय दूसरों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ भी खड़े होते हैं?

अगर पत्रकारिता में निष्पक्षता का पाठ पढ़ाने वाला पत्रकार ही अपने समुदाय में निष्पक्ष नहीं रहेगा, तो उसकी कलम की विश्वसनीयता पर सवाल उठना तय है।

समय आ गया है कि पत्रकारिता में ‘अपना’ और ‘पराया’ का चश्मा उतारा जाए। पत्रकार छोटा-बड़ा नहीं होता, खबर छोटी-बड़ी हो सकती है। संस्थान छोटा-बड़ा हो सकता है, लेकिन सच की कोई श्रेणी नहीं होती।

कलम की ताकत तभी कायम रहेगी, जब कलम किसी व्यक्ति, गुट या स्वार्थ की नहीं, बल्कि सत्य और समाज की आवाज बनेगी।

क्योंकि जिस दिन पत्रकार ही पत्रकार को कम आंकने लगे, उस दिन सवाल सिर्फ पत्रकारिता पर ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद पर भी उठेगा।


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