शिक्षा का बाजारीकरण : आखिर कब तक बिकेगा बच्चों का भविष्य..??
शिक्षा का बाजारीकरण : आखिर कब तक बिकेगा बच्चों का भविष्य..??
लालप्रताप सिंह (कार्यकारी संपादक : सा. यशोमणि)
किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसके प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उसके शिक्षित और जागरूक नागरिक होते हैं। यही कारण है कि दुनिया के विकसित देशों ने शिक्षा को सबसे बड़ा निवेश माना है। दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा का स्वरूप धीरे-धीरे सेवा से व्यवसाय में बदलता दिखाई दे रहा है। आज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने के लिए अभिभावकों को भारी-भरकम फीस, विभिन्न शुल्कों और अनावश्यक आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या शिक्षा अब केवल संपन्न वर्ग का अधिकार बनकर रह जाएगी.?? सरकारी विद्यालयों की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है। अनेक स्थानों पर भवन, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं और शिक्षकों की कमी जैसी समस्याएं आज भी मौजूद हैं। दूसरी ओर निजी विद्यालय आधुनिक सुविधाओं और आकर्षक वातावरण के नाम पर लगातार फीस बढ़ाते जा रहे हैं। मध्यम और निम्न आय वर्ग का परिवार अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए कर्ज लेने तक को मजबूर हो जाता है। शिक्षा का यह बढ़ता आर्थिक बोझ सामाजिक असमानता को और गहरा करता है। यदि देश में वास्तव में समान अवसर की बात करनी है, तो सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था में समानता लानी होगी। ऐसा वातावरण तैयार होना चाहिए, जहां किसी बच्चे की पहचान उसके परिवार की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा और मेहनत से हो। जब हर वर्ग के बच्चों को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा मिलेगी, तभी समाज में वास्तविक समानता स्थापित हो सकेगी।यह भी स्वीकार करना होगा कि केवल निजी विद्यालयों को दोषी ठहराकर समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सरकारी विद्यालयों को इतना सक्षम बनाए कि आम नागरिक को निजी विद्यालयों की ओर देखने की आवश्यकता ही न पड़े। आधुनिक भवन, प्रशिक्षित शिक्षक, डिजिटल शिक्षा, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय और खेल सुविधाएं प्रत्येक सरकारी विद्यालय की पहचान बननी चाहिए। साथ ही निजी विद्यालयों की फीस निर्धारण प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रभावी नियमन भी आवश्यक है, ताकि शिक्षा मुनाफाखोरी का माध्यम न बन सके। देश की प्रगति केवल राजमार्गों, ऊंची इमारतों और औद्योगिक विकास से नहीं मापी जाती। किसी राष्ट्र का वास्तविक विकास उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था से आंका जाता है। यदि आम नागरिक अपने बच्चों की पढ़ाई और परिवार के इलाज के लिए आर्थिक संकट में जीने को विवश है, तो विकास के दावे अधूरे ही माने जाएंगे। शिक्षा कोई वस्तु नहीं है, जिसे बाजार में खरीदा और बेचा जाए। यह प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है। इसलिए समय आ गया है कि शिक्षा को व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व माना जाए। जब सरकार, समाज और शिक्षा संस्थान इस भावना के साथ आगे बढ़ेंगे, तभी एक ऐसा भारत बनेगा जहां किसी बच्चे के सपने उसकी आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसकी क्षमता और परिश्रम से तय होंगे। क्योंकि "जिस देश में शिक्षा बिकने लगे, वहां प्रतिभाएं नहीं, केवल अवसर बिकते हैं और यह किसी भी राष्ट्र के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकता।"

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