क्या छात्रों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है.??

क्या छात्रों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है.?? 

भारत का छात्र वर्ग देश की सबसे बड़ी बौद्धिक और सामाजिक शक्ति है। इतिहास गवाह है कि जब भी अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की आवश्यकता पड़ी, छात्रों ने अग्रिम पंक्ति में रहकर समाज को नई दिशा दी। लेकिन आज एक गंभीर प्रश्न सामने खड़ा है - क्या छात्रों की ऊर्जा और भावनाओं का उपयोग राजनीतिक दल अपने-अपने हित साधने के लिए कर रहे हैं?? लोकतंत्र में विरोध और आंदोलन पूरी तरह वैध हैं। प्रत्येक नागरिक की तरह छात्रों को भी अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। किंतु चिंता तब बढ़ जाती है, जब किसी भी छात्र आंदोलन पर राजनीतिक दलों की सक्रिय छाया दिखाई देने लगती है। यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य छात्रों की समस्याओं के समाधान से अधिक राजनीतिक लाभ प्राप्त करना बन जाए, तो उसके मूल उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यह बात केवल विपक्ष तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी भी दल द्वारा छात्रों का उपयोग राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। छात्रों को विचार देना राजनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन उन्हें राजनीतिक संघर्ष का मोहरा बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।दूसरी ओर, यह मान लेना भी उचित नहीं कि हर छात्र आंदोलन किसी राजनीतिक दल द्वारा संचालित होता है। शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, फीस, छात्रवृत्ति और भविष्य से जुड़े अनेक वास्तविक मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर छात्रों का असंतोष स्वाभाविक हो सकता है। इसलिए हर आंदोलन को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज कर देना भी न्यायसंगत नहीं होगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल छात्रों की आवाज सुनें, उनके मुद्दों का समाधान करें और उन्हें स्वतंत्र सोच के साथ आगे बढ़ने दें। वहीं छात्रों को भी किसी भी आंदोलन में शामिल होने से पहले तथ्यों, उद्देश्यों और संभावित परिणामों का गंभीरता से आकलन करना चाहिए। देश का भविष्य कक्षाओं, प्रयोगशालाओं और ज्ञान के केंद्रों में तैयार होता है, न कि राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़कर। छात्र यदि जागरूक, विवेकशील और स्वतंत्र रहेंगे, तभी लोकतंत्र भी मजबूत होगा और राष्ट्र भी।

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