हरित चिंचोटी के ‘धारावीकरण’ की पटकथा?

हरित चिंचोटी के ‘धारावीकरण’ की पटकथा?

पहाड़ों की कटाई, पेड़ों की कथित बलि और नदी-नालों में भराव से बढ़ रहा निर्माण का जाल; शिकायतों के बावजूद कार्रवाई पर सवाल

वसई (लालप्रताप सिंह) : कभी अपनी हरियाली, पहाड़ियों और प्राकृतिक जलस्रोतों के लिए पहचान रखने वाला चिंचोटी क्षेत्र अब कथित अवैध निर्माण गतिविधियों के चलते तेजी से अपना प्राकृतिक स्वरूप खोता जा रहा है। स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि क्षेत्र में खुलेआम पेड़ों की कटाई, पहाड़ी भूभाग की कटाई तथा नदी-नालों और प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों में कथित रूप से भराव कर निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

स्थिति यही रही तो पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण चिंचोटी क्षेत्र आने वाले समय में अनियोजित बस्तियों के बोझ तले दब सकता है। स्थानीय स्तर पर तो यहां तक सवाल उठने लगे हैं कि कहीं हरित चिंचोटी को धीरे-धीरे ‘दूसरी धारावी’ बनाने की पटकथा तो नहीं लिखी जा रही?

हरा-भरा क्षेत्र अब निर्माण के निशाने पर?

चिंचोटी और आसपास का क्षेत्र लंबे समय से प्राकृतिक हरित पट्टे के रूप में जाना जाता रहा है। यहां मौजूद पेड़-पौधे, पहाड़ी क्षेत्र और प्राकृतिक जलप्रवाह स्थानीय पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लेकिन स्थानीय नागरिकों के अनुसार, पिछले कुछ समय से क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में जमीन को विकसित करने के नाम पर प्राकृतिक भूभाग से कथित छेड़छाड़ की जा रही है। कहीं पहाड़ी हिस्सों को काटकर समतल करने की बात सामने आ रही है तो कहीं प्राकृतिक नालों और जलप्रवाहों में कथित भराव किए जाने के आरोप हैं।

सबसे गंभीर आरोप पेड़ों की कथित कटाई को लेकर है। सवाल यह है कि यदि पेड़ काटे जा रहे हैं तो क्या संबंधित विभाग से नियमानुसार अनुमति ली गई है? यदि अनुमति ली गई है तो उसकी शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं?

नदी-नालों की भराई बनी भविष्य के खतरे का कारण?

चिंचोटी क्षेत्र में प्राकृतिक जलनिकासी व्यवस्था से कथित छेड़छाड़ को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। बरसात के मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों से निकलने वाला पानी प्राकृतिक नालों और जलमार्गों से होकर आगे जाता है।

यदि इन जलमार्गों पर अवैध भराव या निर्माण हुआ है तो इसका सीधा असर बारिश के दौरान आसपास के इलाकों पर पड़ सकता है। पानी का प्राकृतिक रास्ता बाधित होने से जलभराव और बाढ़ की स्थिति गंभीर हो सकती है।

क्या संबंधित विभाग ने ऐसे सभी स्थानों का सर्वेक्षण किया है?

क्या निर्माण से पहले प्राकृतिक जलप्रवाह और जलनिकासी व्यवस्था का अध्ययन किया गया?

यदि नहीं, तो निर्माण गतिविधियों को अनुमति या संरक्षण कैसे मिला?

शिकायतें हुईं, फिर भी कार्रवाई कहां?

पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कथित अवैध गतिविधियों को लेकर संबंधित विभागों के अधिकारियों को शिकायतें दी गई हैं। इसके बावजूद कई स्थानों पर निर्माण गतिविधियां जारी रहने का आरोप है।

यदि शिकायतें अधिकारियों तक पहुंची हैं, तो फिर स्थल निरीक्षण, पंचनामा, नोटिस और कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि केवल शिकायत स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को यह भी बताना चाहिए कि शिकायत के बाद जमीन पर क्या कार्रवाई की गई।

मनपा और वन विभाग की भूमिका पर सवाल

चिंचोटी क्षेत्र से जुड़े कथित निर्माण और पर्यावरणीय नुकसान के मामले में मनपा और वन विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। भूमि का स्वरूप, निर्माण की अनुमति, वृक्ष कटाई, वन क्षेत्र से संबंधित नियम तथा प्राकृतिक जलस्रोतों की सुरक्षा जैसे अलग-अलग विषयों पर संबंधित विभागों की जिम्मेदारी तय होती है।

ऐसे में स्थानीय नागरिकों का सवाल है कि यदि क्षेत्र में कथित रूप से बड़े पैमाने पर भू-भाग बदला जा रहा है तो संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था क्या कर रही है?

‘राजनीतिक संरक्षण’ की चर्चाओं से बढ़ा विवाद

क्षेत्र में कथित निर्माण गतिविधियों को लेकर राजनीतिक संरक्षण की चर्चाएं भी स्थानीय स्तर पर होने का दावा किया जा रहा है। कुछ लोगों द्वारा स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर अप्रत्यक्ष संरक्षण के आरोप लगाए जा रहे हैं।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में संबंधित जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों का पक्ष सामने आना बेहद जरूरी है।

यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित पक्षों को खुलकर स्पष्टीकरण देना चाहिए और यदि आरोपों में तथ्य हैं तो प्रशासन को निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

प्रभावशाली संगठन के नाम की भी चर्चा

स्थानीय स्तर पर एक प्रभावशाली श्रमजीवी संगठन के नाम की चर्चा भी सामने आ रही है। आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ निर्माणकर्ताओं को ऐसे प्रभावशाली नेटवर्क का सहारा मिल रहा है।

लेकिन किसी संगठन या व्यक्ति पर आरोप लगाना गंभीर विषय है। इसलिए इसकी पुष्टि निष्पक्ष जांच के माध्यम से ही होनी चाहिए।

दस सवाल, जिनका जवाब प्रशासन को देना होगा

1. चिंचोटी क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में कितने निर्माणों को अनुमति दी गई?

2. कितने निर्माणों के विरुद्ध शिकायतें प्राप्त हुईं और उन पर क्या कार्रवाई हुई?

3. कथित पहाड़ी कटाई के मामलों में कितने पंचनामे किए गए?

4. पेड़ों की कटाई के लिए कितनी अनुमति जारी की गई?

5. नदी-नालों अथवा प्राकृतिक जलप्रवाहों में भराव की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई?

6. क्या पूरे चिंचोटी क्षेत्र का संयुक्त सर्वेक्षण कराया गया है?

7. कितने निर्माण वैध और कितने संदिग्ध पाए गए?

8. क्या किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी की लापरवाही सामने आई है?

9. क्या राजनीतिक अथवा किसी संगठनात्मक दबाव की शिकायत प्रशासन के संज्ञान में है?

10. हरित चिंचोटी के संरक्षण के लिए तत्काल क्या ठोस कार्ययोजना तैयार की गई है?

अब सिर्फ जांच नहीं, कार्रवाई की जरूरत

स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों की मांग है कि चिंचोटी क्षेत्र का तत्काल मनपा, वन विभाग, राजस्व विभाग और अन्य संबंधित प्राधिकरणों की संयुक्त टीम द्वारा सर्वेक्षण कराया जाए।

संदिग्ध निर्माणों के दस्तावेजों की जांच, जमीन के रिकॉर्ड का सत्यापन, वृक्ष कटाई की अनुमति, प्राकृतिक जलप्रवाहों में हुए कथित भराव तथा पहाड़ी भूभाग में किए गए बदलावों की जांच की जाए।

यदि कहीं नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो केवल निर्माणकर्ता पर कार्रवाई ही नहीं, बल्कि उसे कथित रूप से संरक्षण देने वाले अधिकारियों और अन्य प्रभावशाली लोगों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

चिंचोटी को बचाना है तो अभी जागना होगा!

प्राकृतिक हरित क्षेत्र एक बार नष्ट होने के बाद उसे पुराने स्वरूप में वापस लाना बेहद कठिन होता है। आज यदि पेड़, पहाड़ और जलप्रवाह बचाए गए तो आने वाली पीढ़ियां भी चिंचोटी की हरियाली देख सकेंगी।

लेकिन यदि कथित अवैध निर्माणों और भू-भाग परिवर्तन को इसी तरह नजरअंदाज किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब हरित चिंचोटी की पहचान केवल पुराने दस्तावेजों और तस्वीरों तक सीमित रह जाएगी।

अब सवाल सीधा है—चिंचोटी की हरियाली बचेगी या कथित अवैध निर्माणों का कंक्रीट जंगल उस पर भारी पड़ेगा?

प्रशासन को जवाब देना होगा।

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