चाय पर चर्चा, बारिश की व्यथा... वसई-विरार

चाय पर चर्चा, बारिश की व्यथा... वसई-विरार

— लालप्रताप सिंह, कार्यकारी संपादक, सा. यशोमणि


बारिश की फुहारों के बीच जब किसी चाय की दुकान पर लोग जुटते हैं, तो चाय की चुस्कियों के साथ सबसे अधिक चर्चा यदि किसी विषय की होती है, तो वह है— "इस बार फिर वसई-विरार डूब गया।" यह चर्चा अब नई नहीं रही। हर मानसून में वही सवाल, वही शिकायतें और वही परेशानियां दोहराई जाती हैं। बारिश प्रकृति का वरदान है, लेकिन जब यही बारिश लोगों के लिए अभिशाप बन जाए, तो समस्या केवल मौसम की नहीं रह जाती, बल्कि व्यवस्था, योजना और जवाबदेही की भी बन जाती है। वसई-विरार और नालासोपारा के हजारों परिवार हर वर्ष जलभराव की त्रासदी झेलते हैं। घरों में पानी घुस जाता है, दुकानें बंद हो जाती हैं, सड़कें नदी का रूप ले लेती हैं, रेल सेवा प्रभावित होती है और सामान्य जनजीवन ठप हो जाता है।विडंबना यह है कि वर्षों से इस समस्या पर करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते हैं। नाले चौड़े करने, जल निकासी व्यवस्था सुधारने और बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं की घोषणाएं होती हैं, लेकिन पहली तेज बारिश ही इन दावों की वास्तविकता सामने ला देती है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि हर साल वही इलाके जलमग्न हो जाते हैं? क्या योजनाएं कागजों तक सीमित हैं या फिर बढ़ते शहरीकरण के साथ मूलभूत सुविधाओं का विस्तार नहीं हो पाया? यह भी सच है कि अनियोजित निर्माण, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण, नालों में कचरा और पर्यावरणीय संतुलन से लगातार हो रही छेड़छाड़ ने हालात को और गंभीर बनाया है। यदि विकास प्रकृति की कीमत पर होगा, तो उसका परिणाम भी समाज को ही भुगतना पड़ेगा। इन सबके बीच राहत की बात यह है कि संकट की घड़ी में दमकल, आपदा प्रबंधन, पुलिस और स्वयंसेवी संस्थाएं पूरी निष्ठा से लोगों की सहायता में जुट जाती हैं। कई बार स्थानीय नागरिक भी एक-दूसरे की मदद कर मानवता का परिचय देते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर वर्ष राहत और बचाव ही समाधान है? क्या स्थायी व्यवस्था बनाने की दिशा में उतनी गंभीरता दिखाई जा रही है? चाय की दुकान पर बैठा आम नागरिक अब केवल मौसम को दोष नहीं देता। वह विकास की गुणवत्ता, प्रशासनिक जवाबदेही और जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाता है। उसकी अपेक्षा केवल इतनी है कि हर मानसून उसके परिवार के लिए भय का कारण न बने। अब समय आ गया है कि वसई-विरार के लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक जल निकासी योजना बनाई जाए। प्राकृतिक जलमार्गों का संरक्षण, नालों की नियमित सफाई, अनियंत्रित निर्माण पर रोक और भविष्य की आबादी को ध्यान में रखकर आधारभूत ढांचे का विकास किया जाए। केवल घोषणाओं और निरीक्षणों से समस्या का समाधान नहीं होगा। बारिश हर वर्ष आएगी, यह प्रकृति का नियम है। लेकिन हर वर्ष शहर डूबे, यह किसी भी विकसित होते शहर की नियति नहीं होनी चाहिए। उम्मीद है कि इस बार चाय पर होने वाली चर्चा केवल शिकायतों तक सीमित न रहे, बल्कि समाधान की दिशा में ठोस पहल का आधार बने। तभी बारिश की व्यथा, विकास की नई गाथा में बदल सकेगी।

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