मोबाइल हाथ में, पत्रकारिता जेब में...??

मोबाइल हाथ में, पत्रकारिता जेब में...??

"हर हाथ में मोबाइल है, लेकिन हर हाथ में पत्रकारिता नहीं..."

तकनीक ने दुनिया बदल दी है। आज किसी भी घटना का वीडियो कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। यह बदलाव लोकतंत्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि भी है, क्योंकि अब आम नागरिक भी किसी घटना का प्रत्यक्ष साक्षी बनकर उसे दुनिया के सामने ला सकता है। लेकिन इस सकारात्मक परिवर्तन के साथ एक चिंताजनक प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ी है—मोबाइल रखने वाला लगभग हर व्यक्ति स्वयं को पत्रकार समझने लगा है। आज सोशल मीडिया पर कैमरा ऑन करते ही लोग खुद को "मीडिया", "प्रेस", "न्यूज़ चैनल" या "इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट" घोषित कर देते हैं। न कोई प्रशिक्षण, न पत्रकारिता की नैतिक समझ, न तथ्यों की पुष्टि और न ही कानून की जानकारी। केवल कुछ हजार फॉलोअर्स और एक यूट्यूब चैनल या फेसबुक पेज बन जाने से पत्रकारिता का प्रमाणपत्र नहीं मिल जाता।

पत्रकारिता केवल खबर दिखाना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी के साथ समाज तक पहुंचाना है। एक सच्चा पत्रकार किसी भी सूचना को प्रकाशित करने से पहले उसकी पुष्टि करता है, सभी पक्षों का मत जानता है और यह भी सोचता है कि उसके द्वारा प्रकाशित समाचार का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। वहीं, सोशल मीडिया की अंधी दौड़ में कई लोग पहले वीडियो डालते हैं और बाद में सोचते हैं कि उसका परिणाम क्या होगा। सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि सनसनी और लोकप्रियता की होड़ में कई लोग पत्रकारिता की मर्यादा भूल चुके हैं। किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति की मदद करने के बजाय उसका वीडियो बनाना, किसी परिवार की निजी पीड़ा को "ब्रेकिंग न्यूज़" बना देना, किसी पर बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगा देना या आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा देना—क्या यही पत्रकारिता है..??

पत्रकारिता का उद्देश्य न्याय करना नहीं, बल्कि सत्य को सामने लाना है। अदालत का फैसला अदालत करती है, पत्रकार नहीं। लेकिन आज सोशल मीडिया की तथाकथित पत्रकारिता में कई लोग स्वयं ही जांच अधिकारी, अभियोजक और न्यायाधीश बन बैठे हैं। यह भी स्वीकार करना होगा कि नागरिक पत्रकारिता ने कई बार प्रशासन की लापरवाही, भ्रष्टाचार और अपराधों का पर्दाफाश किया है। अनेक महत्वपूर्ण घटनाएं आम नागरिकों के मोबाइल कैमरे के कारण ही सामने आईं। इसलिए तकनीक को दोष देना उचित नहीं होगा। समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसका गैर-जिम्मेदार उपयोग है। समाज को भी जागरूक होना होगा। केवल वायरल होने से कोई खबर सत्य नहीं हो जाती और केवल कैमरा पकड़ लेने से कोई पत्रकार नहीं बन जाता। पत्रकारिता एक तपस्या है, जिसमें निष्पक्षता, साहस, धैर्य, अध्ययन, संवेदनशीलता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता अनिवार्य है। आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता और सोशल मीडिया के बीच की रेखा स्पष्ट बनी रहे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी उतना ही आवश्यक है। यदि तथ्य, नैतिकता और जिम्मेदारी समाप्त हो जाए, तो सूचना नहीं, केवल भ्रम फैलता है।

मोबाइल खरीदना आसान है, लेकिन पत्रकार बनना आसान नहीं। कैमरा हर किसी के हाथ में हो सकता है, पर पत्रकारिता हर किसी के चरित्र में नहीं होती।

पत्रकारिता कोई शौक नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक गंभीर दायित्व है। इसे पहचान, प्रचार और प्रसिद्धि का माध्यम नहीं, बल्कि सत्य और जनहित की सेवा का संकल्प बने रहने देना ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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